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बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए बालिका केनिया से नवी मुंबई पहुंची

बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए बालिका केनिया से नवी मुंबई पहुंची

सिकलसेल रोग पीड़ित 14 माह की बच्ची पर सफलता पूर्वक उपचार

नवी मुंबई। सिकल सेल रोग का उपचार करने के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) की क्षमताएं प्रदर्शित करने वाली एक सफल प्रक्रिया में, नवी मुंबई में अपोलो कैंसर सेंटर (एसीसीएनएम) के डॉक्टरों ने जटिल प्रक्रिया द्वारा 14 माह आयु वाली एक बालिका का सफलतापूर्वक उपचार किया. केनिया  निवासी इस बालिका में सिकल सेल रोग का पता चला था, जो कि एक ऐसी आनुवंशिक समस्या होती है जिसमें लाल रक्त कोशिकाओं का आकार असामान्य हो जाता है, जिससे शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है. जीवनभर चलने वाली यह बीमारी, गंभीर एनीमिया जैसी जटिलताएं उत्पन्न करती है जिसके लिए खून चढ़ाना पड़ता है, बार-बार गंभीर दर्द होता है, बार-बार संक्रमण होते हैं, स्ट्रोक होता है और कभी-कभी अंग को स्थायी क्षति भी हो जाती है।

रोगी के सिकल सेल रोग के कारण उसे बार-बार दर्द की समस्या हो रही थी, जिसे वैसो-ओक्लूसिव समस्या भी कहा जाता है, और उसे बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती थी. इस रोग से उसके जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने के अलावा, उसके परिवार पर काफी भावनात्मक और वित्तीय बोझ भी पड़ा. इसके समाधान के लिए वे एसीसीएनएम आए. गहन जांच-पड़ताल के बाद, डॉ. विपिन खंडेलवाल, कंसल्टैंट पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट, एसीसीएनएम ने पाया कि बालिका को बीएमटी से लाभ होगा. फिर डोनर की तलाश शुरू हुई. सौभाग्य से, उसका 11 वर्षीय भाई एक आदर्श एचएलए मिलान साबित हुआ, अर्थात उसकी बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए अनुकूल थी. इससे सफल परिणाम की संभावनाएं काफी बढ़ गई. इस मामले में, ट्रांसप्लांट टीम ने एनेस्थीसिया के तहत रोगी के भाई की बोन मैरो से स्टेम कोशिकाएं संकलित कीं. फिर इन स्टेम कोशिकाओं को रोगी के शरीर में सावधानीपूर्वक डाला गया ताकि अंततः स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन शुरू कराया जा सके. जहां प्रक्रिया सफल रही, वहीं ट्रांसप्लांट के बाद बालिका को कुछ जटिलताओं का अनुभव हुआ जिनमें न्यूट्रोपेनिक बुखार और म्यूकोसाइटिस प्रमुख थीं. अपोलो कैंसर सेंटर में समर्पित चिकित्सकीय टीम द्वारा इन समस्याओं को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया गया. उसकी आगामी मुलाकातों में, खून की जांचों में 100% डोनर सेल एन्ग्राफ्टमेन्ट की पुष्टि हुई, जिससे पता चला कि ट्रांसप्लांट की गई स्टेम कोशिकाएं सामान्य ढंग से काम कर रही थीं और स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन हो रहा था. इससे बीएमटी की सफलता की पुष्टि हुई और यह बालिका के उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णायक साबित हुआ।


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