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राजनीति के बारे में अक्सर कही जाती हैं कि यहां न तो कोई स्थायी शत्रु है, न ही कोई स्थायी मित्र

मुंबई : यह दो बातें राजनीति के बारे में अक्सर कही जाती हैं कि यहां न तो कोई स्थायी शत्रु है, न ही कोई स्थायी मित्र और दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। यह सच भी है, क्योंकि राजनीति अनंत संभावनाओं का समुच्चय है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एनएनएस) को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की रवैया इन बातों को सच साबित करता दिख रहा है। एनसीपी के नेता अजित पवार ने मंगलवार को सार्वजनिक रूप से अपील की है कि वोटों का विभाजन टालने के लिए एमएनएस को हमारे साथ आना चाहिए। हालांकि, जूनियर पवार ने इसे व्यक्तिगत राय कहा है, लेकिन उनके इस बयान को महाराष्ट्र की राजनीति में काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। अजित पवार ने कहा, लोकसभा में बीजेपी-शिवसेना को हराना है, तो धर्मनिरपेक्ष विचारधारा स्वीकार कर सभी को एकसाथ आना चाहिए। एमएनएस को भी पिछली बार एक लाख वोट मिले थे। इसीलिए मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि पिछली बातों को भुलाकर वोटों का बंटवारा टालने के लिए सभी को एकजुट हो जाना चाहिए। अब सवाल यह है कि अजित पवार ने यह अपील किससे की है- एमएनएस से या कांग्रेस से! क्योंकि एमएनएस, तो पहले से ही महागठबंधन का हिस्सा बनने को तैयार है, बस कांग्रेस ही है, जो एमएनएस और एमआईएम जैसे कट्टर विचारधारा वाले दलों को महागठबंधन में किसी भी कीमत पर शामिल न करने का ऐलान कर चुकी है।
बता दें कि कांग्रेस के विरोध के कारण ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार को न चाहते हुए भी सोमवार को एमएनएस को ‘ना’ बोलना पड़ा। शरद पवार के बयान के बाद लग रहा था कि महागठबंधन में एमएनएस की एंट्री का चैप्टर खत्म हो गया है, लेकिन दूसरे ही दिन अजित पवार ने अपने चाचा और पार्टी प्रमुख शरद पवार के बयान से अलग नया बयान देकर बंद चैप्टर को फिर से खोल दिया है।
अजित पवार के बयान के मायने टटोलने का काम राजनीतिक विश्लेषक कर रहे हैं। उनका कहना है कि एनसीपी खुले तौर पर न सही, अंदरूनी तौर पर आगामी विधानसभा चुनावों की दृष्टि से एमएनएस के साथ चुनावी तालमेल बनाने की कोशिश कर रही है। तात्कालिक तौर पर इसके पीछे ईशान्य मुंबई यानी उत्तर-पूर्व मुंबई लोकसभा सीट का गणित काम कर रहा है। 2009 में इस सीट पर एनसीपी के संजय दीना पाटील चुनाव जीते थे। तब उन्होंने बीजेपी और शिवसेना के संयुक्त उम्मीदवार किरीट सोमैया को हराया था।
2009 में एनसीपी की इस जीत में एमएनएस की बड़ी भूमिका थी, क्योंकि एमएनएस के शिशिर शिंदे ने शिवसेना-बीजेपी के 1 लाख 95 हजार से ज्यादा वोट काटे थे। इस बार इस सीट से एनसीपी के मुंबई अध्यक्ष सचिन अहिर के इस सीट से लड़ने की चर्चा है, लेकिन सचिन अहिर इस सीट के बाहरी उम्मीदवार होंगे। 2009 में जीते संजय दीना पाटील लंबे समय परिदृश्य से बाहर हैं। ऐसे में खबर यह है कि अपने कोटे की यह सीट एनसीपी, हर हाल में जीतना चाहती है। इसके लिए उसे एमएनएस की मदद जरूरी लग रही है। एनसीपी इस मदद के एवज में एमएनएस को विधानसभा में मदद कर सकती है।
एनसीपी से जुड़े एक नेता का इस बारे में अलग ही दृष्टिकोण है। उनका कहना कि कांग्रेस और शिवसेना के बीच कुछ सीटों पर ‘अंडरस्टैंडिंग’ की अहसास हमें हैं। शिवसेना पिछले 10-12 महीनों से जिस तरह बीजेपी की आलोचना और कांग्रेस के मुद्दों की तरफदारी कर रही है उससे हमें यह अहसास हो रहा है। अगर कांग्रेस अपने फायदे के लिए ऐसा कर सकती है, तो हम तो खुलेआम मनसे को साथ लेने की बात कर रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण पहले ही इस बात का खंडन कर चुके हैं।
महागठबंधन में एंट्री न मिलने के बाद मनसे नेताओं ने उन सीटों की जांच पड़ताल शुरू कर दी है, जहां उसका प्रभाव है। मुंबई, नासिक और पुणे के अलावा मराठवाड़ा की कुछ सीटों पर काम जारी है। मनसे शिवसेना-बीजेपी के ऐसे उम्मीदवारों पर भी नजर रख रही है, जिन्हें दोनों पार्टियों से टिकट नहीं मिलेगा। कुल मिलाकर मामला दिलचस्प होता जा रहा है। 


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